भोपाल/खबर डिजिटल/ हाल में एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर जितेंद्र बिलोटिया काफी सुर्खियों में है, उसने दुबई में एक वीडियो बनाया था, जिसमें जमीन पर बैठकर कहा था कि यहां की सड़कों का ठेकेदार आखिर कौन? उसके बाद जो भी हुआ, वो सब अलग है, उस पर कुछ भी कहने से कोई मतलब नहीं है, लेकिन जिस सवाल को हम आज आपके सामने रख रहे हैं, उस पर विचार करने की जरुरत इसीलिये आन पड़ी, क्योंकि जितेंद्र बिलोटिया के वीडियो में एक बार जो उठाई गई थी, क्यों वो सही है? चूंकि देश के सबसे स्वच्छ इंदौर शहर में जिस तरह से गंदे पानी के कारण एक सैकड़ा लोग बीमार हो गए, और कहा जा रहा है कि दो लोगों की मौत इसी दौरान हुई है, ऐसे में एक सवाल यह बनता है कि आखिर हमारा ड्रैनेज सिस्टम इतना कमजोर क्यों है, कि आखिर पीने के पानी में गंदा पानी मिल जा रहा है।
क्या ड्रैनेज सिस्टम नहीं बन सकता बुलेट प्रूफ
जब शरीर की सुरक्षा गोली से करना होती है, तो उसके लिए बुलेट प्रूफ कार, जैकेट, हेलमेट आदि का उपयोग किया जाता है, लेकिन अभी चिंता गंदे पानी की सता रही है, वो भी इसीलिये कि इंदौर जैसे सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाले शहर में ही हैजे के लक्षण मिल रहे हैं। मां गंगा को धरती पर प्रकट करने वाले भागीरथ की याद में नाम रखने वाले भागीरथपुरा में करीब 100 लोग गंदा पानी पीकर बीमार पड़े हैं, लेकिन उनकी सुध लेने के साथ अब इसका उपाय भी करना होगा, कि कुछ ही सालों में ड्रैनेज सिस्टम चरमरा क्यों जाता है, जबकि टेक्नॉलॉजी काफी हाई हो चुकी है, फिर भी अब तक इसका समाधान क्यों नहीं निकाला गया।
नया पार्षद नई सड़क, नई ड्रेनेज लाइन, नई पाईप लाइन
इस बात से शायद कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद में जब भी चुनाव होते हैं, नया पार्षद आता है, वो अपने कार्यकाल में हर गली, मोहल्ले, चौक-चौराहे की सड़क को नया बनवाने में जुट जाता है, कम से कम एक साल रहवासी परेशान होते ही हैं। इसी तरह का हाल ड्रैनेज सिस्टम, पानी की लाइन का भी होता है, पर जब इसके पहले ही लीकेज की संभावना बन जाए, तो रहवासियों की जान पर बन आती है, इंदौर के भागीरथपुरा में तो यह निकलकर सामने आ गया, बनिस्बत हर छोटी-मोटी जगह पर ऐसी समस्या आती ही होगी, जोकि बंद पर्दों के पीछे छिप जाती है।
क्या सिस्टम के आगे हार जाती है टेक्नॉलॉजी
किसी भी बड़ी सड़क पर देखा गया है कि मुख्य लाइन काफी सालों तक चलती है, या कहें सालों-साल तक चलती है। स्ट्रॉम वॉटर लाइन बदलते कम ही देखा गया है, हालांकि उसके ऊपर लगी टाइल्स जरुर बदलते देख लिया होगा। ऐसा आखिर क्यों होता है, ये सवाल तो उठता है कि उसमें ऐसी कौनसी टेक्नॉलॉजी का उपयोग किया जाता है कि उसको बदलने में सालों या कहें की सड़क चौड़ीकरण पर ही बदला जाता है, ऐसे में सब लाइन को साल बदलने की जरुरत क्यों पड़ती है, क्या इसे सिस्टम कहें या पैसों की बंदरबांट, कि यह जरुर करना ही होगा, वरना विकास का पहिया थम जाएगा।
जानकारों ने बताई सच्चाई
जानकार बतातें है कि अगर सहीं से अधोसंरचनात्मक तरीके से काम किया जाए तो ऐसी स्थिति नहीं बने। उनका कहना है कि सड़क पर सड़क बनाकर कई जगहों पर लोगों की घरों की ऊंचाई को कम करने का खेल सालों से चल रहा है, लेकिन उस पर बोलने वाला कोई नहीं है। ऐसे कई नजारे आसपास ही देखने को मिल जाएंगे कि जहां पर सड़क को पूरा खोदने के बाद बनाने की बजाय, उसी पर अगली लेयर चढ़ा दी जाती है, और उसके बिल भी धड़ल्ले से पास कराकर अगली बार का इंतजार किया जाता है। ड्रैनेज सिस्टम के भी यही है, कि अगर सालों साल चलने वाली लाइन डाल दी जाएगी, तो अगले साल विकास का पहिया कैसे घूमेगा, तो कुल मिलाकर फिर वही सवाल छोड़ते है कि ड्रैनेज का पानी, पीने के पानी में आखिर मिल कैसे जाता है, वो भी डिजिटल और टेक्नॉलॉजी से भरपूर इस आधुनिक युग में।









