भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है. इस साल यह पावन पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा. हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व बताया गया है. सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं. वहीं अविवाहित लड़कियां भी मनपसंद जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं.
हरतालिका तीज का व्रत काफी कठिन माना जाता है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो पहली बार इसे रखने जा रही हैं. ऐसे में व्रत शुरू करने से पहले इससे जुड़े जरूरी नियमों और पूजा से संबंधित बातों की जानकारी होना बेहद जरूरी है.
सूर्योदय से अगले दिन तक रखा जाता है निर्जला व्रत
हरतालिका तीज में निर्जला व्रत रखने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रती महिला सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक न तो भोजन करती है और न ही पानी ग्रहण करती है. इसी वजह से इसे कठिन व्रतों में शामिल किया जाता है.
मान्यता है कि एक बार हरतालिका तीज का व्रत शुरू करने के बाद इसे हर साल विधि-विधान के साथ करना चाहिए. इसे बीच में छोड़ना उचित नहीं माना जाता. इसलिए पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पहले से तैयारी कर लेनी चाहिए.
16 श्रृंगार का भी है खास महत्व
हरतालिका तीज की पूजा में 16 श्रृंगार का विशेष महत्व माना गया है. इस दिन सुहागिन महिलाएं सिर से लेकर पैर तक पूरे सोलह श्रृंगार करती हैं और इसके बाद पूजा में शामिल होती हैं. पूजा के दौरान माता पार्वती को सुहाग से जुड़ी वस्तुएं अर्पित करने की परंपरा है. मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है और वैवाहिक जीवन में सुख-सौभाग्य बना रहता है.
तीज की रात जागरण करने की परंपरा
हरतालिका तीज के दौरान रात में सोना वर्जित माना गया है. धार्मिक परंपरा के अनुसार, व्रती महिलाओं को पूरी रात जागकर भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करना चाहिए. इस दौरान भजन-कीर्तन, शिव-पार्वती के मंत्रों का जाप और धार्मिक जागरण किया जाता है. माना जाता है कि रातभर श्रद्धा के साथ जागरण करने से व्रत का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है.
मिट्टी या रेत से बनाई जाती हैं प्रतिमाएं
हरतालिका तीज की पूजा के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाने की भी परंपरा है. इसके लिए रेत या काली मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है और प्रतिमाओं को व्रती स्वयं अपने हाथों से तैयार करती हैं. इसके बाद विधि-विधान के साथ इन प्रतिमाओं की पूजा की जाती है.
प्रदोष काल में जरूर पढ़ें या सुनें व्रत कथा
हरतालिका तीज की पूजा शाम के समय प्रदोष काल में शुभ मुहूर्त देखकर की जाती है. पूजा के दौरान हरतालिका तीज की व्रत कथा पढ़ना या सुनना जरूरी माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत कथा के बिना पूजा और व्रत को पूर्ण नहीं माना जाता. इसलिए पूजा की तैयारी करते समय कथा की व्यवस्था पहले से कर लेना बेहतर होता है.
अगले दिन ऐसे करें व्रत का पारण
हरतालिका तीज का व्रत अगले दिन सुबह अंतिम पूजा और आरती के बाद खोला जाता है. इसके बाद जल ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है. पारण से पहले किसी ब्राह्मणी या बुजुर्ग सुहागिन महिला को सुहाग से जुड़ी सामग्री दान करने की भी परंपरा बताई गई है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से व्रत का पुण्य प्राप्त होता है और माता पार्वती का आशीर्वाद बना रहता है.
नोट: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है. अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में हरतालिका तीज के नियमों और पूजा विधि में कुछ अंतर हो सकता है.









