मैं मध्यप्रदेश हूँ. हिन्दुस्तान का ह्दय प्रदेश. मेरी पहचान है सतपुड़ा के घने जंगल, कल...कल कर बहती नर्मदा, ताप्ति, चंबल, बेतवा जैसी जीवनदायिनी नदियां. मेरी पहचान है अकूत खनिज सम्पदा लौह, अयस्क, तांबा, जस्ता और हीरा. मैं एक प्रदेश ही नहीं हूँ. एक परम्परा हूँ जी हाँ, सर्वधर्म और समभाव की परम्परा का प्रदेश. आज ही के दिन अर्थात एक नवम्बर को मेरा जन्म हुआ था. साल उन्नीस सौ छप्पन में जब मुझे मध्यप्रदेश का नाम मिला तब मैं भारत के सबसे बड़े भूभाग वाला प्रदेश हुआ करता था...झाबुआ से लेकर बस्तर तक मेरी धडक़न महसूस की जा सकती थी. सन् दो हजार तक मैं भारत देश का सबसे बड़ा भूभाग वाला प्रदेश था. इसी दिन मेरे जन्म के साथ मेरा विघटन भी हो गया. मुझसे अलग कर छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिल गया.
उन्नहत्तर साल पहले जब मेरा जन्म हुआ था. साल 2025 में मेरा जो चेहरा-मोहरा है, वह साल 1956 में नहीं था. तब मैं आज की तरह सुडौल नहीं था. न ही मेरी विकास की कोई कहानी थी. मैं बिखरा बिखरा सा था. मेरा निर्माण विंध्य, मध्यभारत, भोपाल रियासत एवं महाकोशल को मिलाकर हुआ. स्वप्रदृष्टा पंडित रविशंकर शुक्ल के हाथों मेरा पहले-पहल लालन-पालन हुआ.पंडित शुक्ल ने मेरे लिये सपने बुने थे. नियति को यह मंजूर नहीं था...बहुत थोड़े समय अपना स्नेह देकर वे हमेशा-हमेशा के लिये मेरा साथ छोड़ कर पंचतत्व में विलन हो गये. मेरी सल्तन के पहले मुख्यमंत्री होने का गौरव पंडित रविशंकर शुक्ल के खाते में है. दिन पर दिन गुजरते गये. एक के बाद दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे हाथों ने मुझे तराशा. मुझे संवारा.मैं आकार लेने लगा.उन्नीस सौ छप्पन से दो हजार पच्चीस तक मेरी विकास की गति थमी नहीं है.
इन सालों के सफर की कहानी रोचक है. रोमांचक है. कई कई मोड़ आये. मैंने कई शासकों को देखा है और परखा है. सबने अपनी अपनी दृष्टि और समझ से मेरे विकास की रूपरेखा तय की.राज किसी भी दल ने किया. मुख्यमंत्री कोई भी रहा. हर बार सत्ता सम्हालने वालों ने मेरे विकास के लिये रास्ता ढूंढ़ा. कहते हैं पानी अपना रास्ता स्वयं बना लेता है. बस मैं भी पानी की तरह बहता रहा. जब जहाँ जब अवसर मिला, मैंने अपने लिए विकास का रास्ता बना लिया. मेरी सल्तनत जिन हाथों ने सम्हाली उनमें सबसे कम एक दिन के मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुनसिंह को भी याद किया जाएगा. तो पन्द्रह दिनों के लिये मुख्यमंत्री के रूप राजा नरेशचन्द्र का नाम भी इतिहास में दर्ज है. सर्वाधिक लम्बे समय तक मेरी सल्तनत सम्हालने वालों में मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराजसिंह चौहान पहले और दूसरे नंबर पर दिग्विजयसिंह रहे. अभी डॉ. मोहन यादव मुझे विकास की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में लगे हैं.
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुझे और सशक्त बना दिया है.. कानून तोडऩे वालों और प्रदेश में अशांति मचाने वालों को ठिकाने लगाने में पीछे नहीं रहे। पहली बार ऐसा हुआ-‘नो बकवास, सीधी बात’ की तर्ज पर ऑन द स्पॉट फैसला होने लगा. मैं हतप्रभ हूँ कि कभी मेरी जमीं पर ही एक-एक समस्या के लिए चक्कर लगाना पड़ता था, अब बकवास की जगह खत्म हो गई है. मोहन सरकार ने कई ऐसे फैसले किए हैं कि लोगों में भरोसा जाग गया है. आपको याद दिला दूँ कि मेरे ही सल्तनत में बेकार हो चुके हजारों कामगारों को सालों से उनका हक नहीं मिला था. अपने ही पैसों के लिए परेशान थे. मामला इंदौर की हुकूमचंद मिल का था. मोहन सरकार ने एक झटके में उन्हें उनका हक दे दिया. यही नहीं, मेरा माथा गर्व से ऊँचा हो गया जब दूसरे अन्य मिलों में सालों से ठंडे बस्ते में पड़े मामलों को निपटाने की पहल की जाने लगी.
धर्मनिरपेक्षता की जो मेरी पहचान है, वह आजतलक मह$फूज है. एक वाकया जरूर सुनाना चाहूँगा. बात उज्जैन की है. शहर के विकास के लिए कुछ व्यवस्थित करने का प्लान बना. समस्या आयी कि बरसों से स्थापित धर्मस्थल को कैसे हटाया जाए? और वो भी दर्जन भर से अधिक. लेकिन जो कुछ हुआ, वह पूरे हिन्दुस्तान के लिए मिसाल बन गया. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरपरस्ती में सभी लोगों ने आपसी चर्चा कर अपने अपने धर्मस्थल को शिफ्ट कर लिया. एक पत्ता तक नहीं खडक़ा. अद्भुत, अविस्मरणीय फैसला. मोहन सरकार का यह फैसला मुझे आश्वस्त करता है कि मैं सचमुच में हिन्दुस्तान का ह्दयप्रदेश हूँ.
यह तो महज बानगी है मेरे विकास यात्रा की. विकास तो अभी शुरू ही हुआ है, अभी तो गाथा लिखा जाना शेष है. खुशियां, हंसी, मुस्कान और आत्मसम्मान से भरा हर नागरिक मेरा गर्व है... मैं आज अपने जन्मदिन पर इठला सकता हूँ... इतरा भी सकता हूँ... इतने लम्बे समय की प्रतीक्षा के बाद, मैं चल पड़ा हूँ एक नए मध्यप्रदेश की डगर पर. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्ष से संबद्ध हैं)







