प्राकृतिक संसाधन क्यों हैं जलवायु और आय सुरक्षा का आधार

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प्राकृतिक संसाधन क्यों हैं जलवायु और आय सुरक्षा का आधार

- ध्रुवी शाह, एग्जीक्यूटिव ट्रस्टी & सीईओ, एक्सिस बैंक फाउंडेशन

हर साल, पृथ्वी दिवस हमें अपनी धरती की स्थिति पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। हालांकि, ग्रामीण भारत में यह विचार पूरी तरह से व्यावहारिक है। यहाँ पृथ्वी दिवस का सार हर दिन जिया जाता है—बारिश का इंतज़ार करते खेतों में, उन कुओं में जो हर गर्मी में जल्दी सूख जाते हैं, और उन घरों में जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति ही उनकी आय, खाद्य सुरक्षा और सम्मान को तय करती है।

देखा जाए तो देश के गांवों में जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा, यह एक आर्थिक हकीकत बन चुका है।

बारिश पर निर्भर और सूखा प्रभावित इलाकों में ग्रामीण परिवारों के सामने अनिश्चितता तेजी से बढ़ रही है। अनियमित बारिश, देर से आने वाला मानसून, बाढ़ और भूमि की गुणवत्ता में गिरावट खेती के चक्र को बिगाड़ रहे हैं और आजीविका को कमजोर कर रहे हैं। जो पहले मौसमी बदलाव सामान्य माने जाते थे, अब वे आय में अस्थिरता का कारण बन रहे हैं। इसका असर छोटे किसानों, आदिवासी समुदायों, महिला मुखिया वाले परिवारों, प्रवासी मजदूरों और जंगल पर निर्भर परिवारों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है।

इसी वजह से पृथ्वी दिवस पर एक व्यापक चर्चा की जरूरत है—जिसमें पर्यावरण की मजबूती को सीधे ग्रामीण आय और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ा जाए।

प्राकृतिक संसाधन और आजीविका: एक ही सिक्के के दो पहलू

जमीनी स्तर पर एक्सिस बैंक फाउंडेशन (एबीएफ) के काम से एक बात साफ होती है—पानी, मिट्टी और जमीन सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि जीवन और आजीविका की नींव हैं।

जब मिट्टी कमजोर हो जाती है और पानी की उपलब्धता अनिश्चित होती है, तो किसान परिवार एक ही फसल पर निर्भर रह जाते हैं और कर्ज में फंसते हैं। लेकिन जब इन संसाधनों को मजबूत किया जाता है, तो परिवारों को बदलाव के अवसर मिलते हैं—उत्पादन बढ़ाने, जोखिम कम करने और आय के नए स्रोत बनाने के रूप में।

इसलिए मजबूती (रेज़िलिएंस) का मतलब सिर्फ जलवायु के झटकों से निपटना नहीं है, बल्कि इसका मतलब ऐसे सिस्टम बनाना है जो तनाव झेल सकें और लंबे समय तक आय को स्थिर रख सकें।

एबीएफ ने वाटरशेड विकास, मिट्टी और नमी संरक्षण, और जल प्रबंधन में निवेश के माध्यम से समुदायों को पानी की उपलब्धता सुधारने और जमीन का बेहतर उपयोग करने में मदद की है।

सिर्फ खेती अब पर्याप्त नहीं है

अनुभव यह भी बताता है कि भविष्य में, जब जलवायु का दबाव बढ़ेगा, तब सिर्फ खेती के भरोसे ग्रामीण आय सुरक्षित नहीं रह सकती।

भले ही प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से खेती की उत्पादकता बढ़े, लेकिन अगर आय सिर्फ एक ही मौसम-निर्भर काम पर टिकी हो, तो परिवार जोखिम में रहते हैं। इसलिए आजीविका के विविध स्रोत बनाना जरूरी है।

एबीएफ द्वारा समर्थित कार्यक्रमों के माध्यम से, परिवार अब आय के कई स्रोत बना रहे हैं—जैसे पशुपालन, कृषि-वानिकी (agroforestry), सूक्ष्म उद्यम और कौशल-आधारित स्वरोजगार। ये विकल्प जोखिम को कम करते हैं और हर मौसम में आय का प्रवाह बनाए रखते हैं।

सामुदायिक संस्थाओं का महत्व

इनमें से कोई भी बदलाव अकेले नहीं होता। स्वयं सहायता समूह (SHGs), किसान संगठन और स्थानीय समितियां साझा संसाधनों के प्रबंधन और प्रगति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें से कई संस्थाओं का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं, जो पर्यावरण की देखभाल और घरेलू स्थिरता दोनों को मजबूत कर रही हैं।

उत्साहजनक बात यह है कि बदलाव के शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं। संसाधनों की बेहतर उपलब्धता और विविध आजीविका के कारण कई क्षेत्रों में मजबूरी में होने वाले पलायन में कमी आई है और परिवारों का आत्मविश्वास बढ़ा है।

पृथ्वी दिवस: समग्र सोच की पुकार

केवल वित्तीय वर्ष 2025–26 में, एक्सिस बैंक फाउंडेशन का काम देश भर के 2.75 लाख से अधिक परिवारों तक पहुँचा। इससे हमें यह समझने का मौका मिला कि कैसे जलवायु परिवर्तन ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को बदल रहा है और हम इसका सामना कैसे कर सकते हैं।

एबीएफ अपने 'मिशन 4 मिलियन' लक्ष्य (2031 तक चालीस लाख परिवारों तक पहुँचना) की ओर बढ़ रहा है। हमारा ध्यान उन क्षेत्रों पर अधिक है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील हैं—जैसे वर्षा आधारित, सूखाग्रस्त और नाजुक पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र।

इस पृथ्वी दिवस पर संदेश साफ है—पर्यावरण की मजबूती और आर्थिक स्थिरता को अब अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों एक ही तंत्र के हिस्से हैं।

प्राकृतिक संसाधनों में निवेश सिर्फ पर्यावरण सुधारने के लिए नहीं है, बल्कि आय को सुरक्षित करने, जोखिम कम करने और ग्रामीण परिवारों को अधिक स्थिर और सम्मानजनक भविष्य देने के लिए भी जरूरी है।

ग्रामीण भारत में, पृथ्वी की रक्षा करना और आजीविका की रक्षा करना—दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

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