समावेशी भारत के निर्माण का रोडमैप

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समावेशी भारत के निर्माण का रोडमैप

लेखक – परमेश शाहनी, प्रमुख, गोदरेज डीईआई लैब

विकसित भारत का सच्चा मापदंड इस बात में निहित है कि वह अपने सभी नागरिकों को, जिनमें समाज में हाशिए पर रहने वाले समुदाय भी शामिल हैं, उन्हें कैसे ऊपर उठाता है। लेखक परमेश शाहनी का यह लेख LGBTQIA+ समुदाय के संदर्भ में समावेशी भारत के निर्माण के लिए चार प्रमुख प्राथमिकताओं पर जोर देता है।


समावेशी विकास की आवश्यकता

  • असमानता का खतरा: समावेश के बिना आर्थिक विकास केवल असमानता को और गहरा करता है।
  • समान ध्यान: भारत को अपनी विकास यात्रा को तेज़ करने के साथ-साथ सामाजिक प्रगति पर भी समान ध्यान देना आवश्यक है।
  • प्रगति और खाई: 2018 में समलैंगिकता को अपराधमुक्त करने के बावजूद, LGBTQIA+ समुदाय के लिए प्रगति स्थिर रही है, लेकिन असमानता की खाई अभी भी बनी हुई है।
  • समाधान: क्वीयर लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए परोपकार, सरकार और सिविल सोसाइटी संगठनों (CSOs) के बीच सहयोग महत्वपूर्ण है।

समावेशी भारत की चार प्रमुख प्राथमिकताएँ

समावेशी भारत की नींव इन चार स्तंभों पर टिकी है:

1. क्वीयर-अनुकूल मूलभूत सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच

  • स्वास्थ्य सेवाएँ: ग्रामीण और शहरी भारत में चिकित्सकीय पेशेवरों को संवेदनशील बनाना और स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना।
  • दस्तावेज़: जेंडर-अनुकूल दस्तावेजों तक पहुंच को सरल बनाना।
  • भेदभाव-विरोधी उपाय: भेदभाव-विरोधी प्रणालियों को मजबूत करना और "कन्वर्ज़न थेरेपी" जैसी हानिकारक प्रथाओं पर सख्ती से रोक लगाना।
  • आवश्यकता: जमीनी स्तर की पहलों में निवेश करना जो जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा दें।

2. समुदाय-नेतृत्व वाले संकट प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना

  • सुरक्षा जाल: आश्रय स्थल, कानूनी सहायता, और सहकर्मी नेटवर्क उन लोगों को सुरक्षा और सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण हैं जो संकट में हैं।
  • फंडिंग: क्वीयर-नेतृत्व वाले संगठनों के लिए लचीली फंडिंग आवश्यक है।
  • सरकारी योजनाएँ: "गरिमा गृह" जैसी सरकारी योजनाओं के साथ समन्वय स्थापित करना, ताकि मजबूत और समावेशी ढांचा तैयार हो सके।

3. नीतिगत सुधार को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ना

  • समन्वय: व्यवहार परिवर्तन और जनसंवेदनशीलता को कानूनी प्रगति के साथ-साथ चलना चाहिए।
  • शासन में भागीदारी: सहभागी नीति-निर्माण को बढ़ावा देना और शासन में क्वीयर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
  • दीर्घकालिक परोपकार: परोपकार की भूमिका अल्पकालिक लक्ष्यों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक, विश्वास-आधारित फंडिंग की ओर जानी चाहिए, जो समावेशी मानसिकता को जड़ें जमाने दे।

4. विश्वसनीय, समुदाय-केंद्रित डेटा और साक्ष्य का निर्माण

  • जनगणना में समावेशन: राष्ट्रीय जनगणना और अन्य सर्वेक्षणों में क्वीयर व्यक्तियों को शामिल करना।
  • लक्षित हस्तक्षेप: लैंगिक रूप से पृथक और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील डेटा लक्षित हस्तक्षेपों को दिशा दे सकता है, विशेषकर ग्रामीण, दलित, आदिवासी और निम्न-आय वर्ग के लोगों के लिए।
  • जमीनी स्तर का शोध: फंडर्स को जमीनी स्तर के शोध और दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करना चाहिए ताकि निर्णय अधिक समावेशी बन सकें।

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