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जानिए क्या कहती है, संविधान की 10वीं अनुसूची

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जानिए क्या कहती है, संविधान की 10वीं अनुसूची

राज्यपाल ने अपने दूसरे पत्र में मध्यप्रदेश राज्य में 10 वीं अनुसूची लागू होने के उल्लेख किया हैं। आईए जानते है क्या है यह और इसमें किसे कितनी शक्तियां हैं।

संविधान की 10वीं अनुसूची (10th Schedule of the Constitution)

संदर्भ: कर्नाटक के 10 विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों और व्हिप की अवहेलना करने पर अयोग्य ठहराया जा सकता है। यह निर्णय अब अध्यक्ष को करना है क्योंकि उनके पास संविधान की 10 वीं अनुसूची को लागू करने की शक्तियां हैं, जिसे दलबदल विरोधी अधिनियम (Anti-defection Act) के रूप में भी जाना जाता है।

दलबदल विरोधी अधिनियम क्या है?

संविधान में दसवीं अनुसूची को 1985 में 52 वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।

यह उस प्रक्रिया का वर्णन करती है जिसके द्वारा विधायकों अथवा सांसदों को सदन के किसी अन्य सदस्य की याचिका के आधार पर विधानसभा या संसद के पीठासीन अधिकारी द्वारा दलबदल के आधार पर अयोग्य ठहराया जा सकता है।

दलबदल के आधार पर अयोग्यता के प्रश्न पर निर्णय सदन के अध्यक्ष को लेना होता है, और उनका निर्णय अंतिम होता है।

यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू होता है।

अयोग्यता:

यदि किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य:स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, याअपनी राजनीतिक पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करता है, या सभा में मतदान नहीं करता है। हालांकि, यदि सदस्य ने पूर्व अनुमति ले ली है, या इस तरह के मतदान के लिए 15 दिनों के भीतर पार्टी द्वारा उसकी निंदा की जाती है, तो सदस्य को अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा।यदि चुनाव के बाद कोई निर्दलीय उम्मीदवार किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।यदि विधायिका का सदस्य बनने के छह महीने बाद कोई नामित सदस्य किसी पार्टी में शामिल होता है।

कानून के तहत अपवाद:

विधायक कुछ परिस्थितियों में अयोग्यता के जोखिम के बिना अपनी पार्टी को बदल सकते हैं। कानून एक पार्टी के साथ या किसी अन्य पार्टी में विलय करने की अनुमति देता है बशर्ते कि उसके कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों। ऐसे परिदृश्य में, न तो वे सदस्य जो विलय का फैसला करते हैं, और न ही मूल पार्टी के साथ रहने वाले सदस्यों को अयोग्य ठहराया जा सकता है।

पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है:

कानून में कहा गया है कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं है। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त को समाप्त कर दिया, जिससे उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में पीठासीन अधिकारी के फैसले के खिलाफ अपील की जा सकती है। हालाँकि, यह माना गया कि जब तक पीठासीन अधिकारी अपना आदेश नहीं देता तब तक कोई न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

दलबदल विरोधी कानून के लाभ:

पार्टी निष्ठा में परिवर्तन को रोककर सरकार को स्थिरता प्रदान करता है।यह सुनिश्चित करता है कि उम्मीदवार पार्टी और साथ ही उस पार्टी के लिए मतदान करने वाले नागरिकों के प्रति निष्ठावान बने रहें।पार्टी में अनुशासन को बढ़ावा देता है।दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों को आकर्षित किए बिना राजनीतिक दलों के विलय की सुविधा देता है।राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार को कम करने की संभावना होती है।उस सदस्य के खिलाफ दंडात्मक उपायों का प्रावधान करता है जो एक पार्टी से दूसरे में शामिl होते हैं।

कानून द्वारा उत्पन्न चुनौतियों को दूर करने के लिए विभिन्न सिफारिशें:

1: चुनाव सुधारों पर दिनेश गोस्वामी समिति: अयोग्यता निम्नलिखित मामलों तक सीमित होनी चाहिए:

एक सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।

एक सदस्य मतदान से परहेज करता है, या विश्वास प्रस्ताव या अविश्वास प्रस्ताव में पार्टी व्हिप के विपरीत वोट करता है। राजनीतिक दल तभी व्हिप केवल तभी जारी कर सकते थे जब सरकार खतरे में हो।

2. विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट)

ऐसे प्रावधान जो योग्यता से विभाजन और विलय को छूट देते हैं, समाप्त किये जाने चाहिए।

चुनाव पूर्व चुनावी मोर्चों को दलबदल विरोधी कानून के तहत राजनीतिक दलों के रूप में माना जाना चाहिए।

राजनीतिक दलों को व्हिप जारी करने को केवल उन मामलों में सीमित करना चाहिए जब सरकार खतरे में हो।

3. चुनाव आयोग:

दसवीं अनुसूची के तहत निर्णय राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह पर किए जाने चाहिए।

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