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बिजली के मनमाने बिल, पानी की योजनाएं अधूरी—अधिकारियों को फिर मिले ‘निर्देश’, बदलाव अब भी सवालों में
खबर डिजिटल संवाददाता कटनी, 29 अप्रैल — जिला पंचायत की सामान्य सभा की बैठक इस बार भी सवालों और नाराजगी के बीच सिमटकर रह गई। उपाध्यक्ष अशोक विश्वकर्मा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में जनप्रतिनिधियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, कृषि और सड़कों जैसे बुनियादी मुद्दों पर बेबाकी से सवाल उठाए, लेकिन जवाबों में ठोस समाधान कम और औपचारिक जानकारी ज्यादा नजर आई।बैठक में मौजूद सदस्यों—अजय गोटिया, कविता राय और प्रदीप त्रिपाठी सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने साफ तौर पर विभागीय लापरवाही को लेकर नाराजगी जताई। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए गए।बिजली बिलों पर भड़का गुस्सासबसे ज्यादा नाराजगी मध्यप्रदेश विद्युत मंडल द्वारा ग्राम पंचायतों को भेजे जा रहे अनाप-शनाप बिजली बिलों को लेकर दिखी। सदस्यों ने इसे सीधा अन्याय बताते हुए कहा कि ग्रामीण निकायों पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है, लेकिन विभाग की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला।पानी की योजनाएं कागजों में ‘फिट’जल निगम और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की नल-जल योजनाओं पर भी सवाल उठे। जमीन पर योजनाओं की स्थिति कमजोर बताई गई, जबकि रिपोर्ट्स में सब कुछ सुचारू दिखाया जा रहा है। यह अंतर प्रशासनिक दावों की पोल खोलता नजर आया।किसानों को सिस्टम ने किया परेशानउपार्जन प्रक्रिया में स्लॉट बुकिंग की समस्या पर भी सदस्यों ने चिंता जताई। किसानों को समय पर स्लॉट नहीं मिलने से वे भटकने को मजबूर हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग इस मुद्दे पर भी ठोस व्यवस्था बनाने में नाकाम दिखे।निर्देशों का ढेर, कार्रवाई फिर अधर मेंजिला पंचायत सीईओ सुश्री हरसिमरनप्रीत कौर ने बैठक में सुझावों को मिनिट्स में दर्ज कर अधिकारियों को ‘तत्परता से कार्रवाई’ के निर्देश जरूर दिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये निर्देश भी पिछली बैठकों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएंगे?आयुष्मान और जल अभियान—ज्यादा प्रचार, कम असर?आयुष्मान कार्ड के प्रचार-प्रसार और जल गंगा संवर्धन अभियान पर भी चर्चा हुई, लेकिन जमीनी हकीकत इन योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रही है। कागजी प्रेजेंटेशन में योजनाएं सफल दिखती हैं, पर ग्रामीण इलाकों में हालात अलग कहानी बयां करते हैं।निष्कर्ष:बैठक में मुद्दे तो गंभीर उठे, लेकिन समाधान की दिशा अब भी धुंधली है। हर बार की तरह इस बार भी ‘निर्देश’ दिए गए हैं—अब देखना यह होगा कि ये निर्देश जमीनी बदलाव लाते हैं या फिर एक और बैठक की फाइल बनकर रह जाते हैं।







