कर्नल सोफिया कुरैशी पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में मध्यप्रदेश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. कांग्रेस ने प्रदेश सरकार पर मंत्री विजय शाह को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप लगाया है. पार्टी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुख्यमंत्री मोहन यादव समेत पूरे मंत्रिमंडल को बर्खास्त करने की मांग की है.
मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर कहा कि सरकार द्वारा विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की अनुमति नहीं देने का फैसला गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करता है. उनका आरोप है कि सत्ता में बैठे लोगों को कानूनी जवाबदेही से बचाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया के रास्ते में बाधा खड़ी की जा रही है.
एसआईटी की रिपोर्ट का हवाला
पटवारी ने अपने पत्र में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल यानी एसआईटी अपनी जांच पूरी कर चुका है और उसने शाह के खिलाफ अभियोजन की अनुमति देने की मांग की है. ऐसे में राज्य सरकार की ओर से इस मामले पर आगे कार्रवाई नहीं किए जाने को कांग्रेस ने गंभीर मुद्दा बनाया है.
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जांच एजेंसी अभियोजन की जरूरत बता रही है तो सरकार इस दिशा में फैसला लेने से क्यों पीछे हट रही है. कांग्रेस नेता के मुताबिक इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति कानून और न्यायिक प्रक्रिया से ऊपर हैं.
कैबिनेट बैठक को लेकर भी विवाद
यह मामला उस समय और चर्चा में आया जब मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में मंगलवार को कैबिनेट की बैठक हुई. उम्मीद थी कि बैठक में विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी से जुड़ा प्रस्ताव रखा जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
बैठक के बाद जब लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह से इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि कैबिनेट के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया था. वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने भी बाद में इसकी पुष्टि की.
हालांकि, सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि कैबिनेट की औपचारिक बैठक के बाद अधिकारियों को बाहर भेज दिया गया और कुछ वरिष्ठ मंत्रियों तथा अधिकारियों की मौजूदगी में शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी नहीं देने को लेकर चर्चा हुई. सरकार की ओर से इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई
विजय शाह से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही मध्यप्रदेश सरकार को निर्देश दे चुका है कि वह दो सप्ताह के भीतर अभियोजन की मंजूरी पर अपना निर्णय ले. इस मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को निर्धारित है.
इसी वजह से मंगलवार की कैबिनेट बैठक को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर काफी उम्मीदें थीं. लेकिन बैठक में इस विषय पर प्रस्ताव नहीं आने के बाद कांग्रेस ने सरकार पर सवाल खड़े कर दिए.
राष्ट्रपति से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
जीतू पटवारी ने अपने पत्र में कहा कि मामला अब केवल विजय शाह की कथित टिप्पणी तक सीमित नहीं रह गया है. उनके अनुसार मुख्यमंत्री और पूरे मंत्रिमंडल की संवैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी भी इस मुद्दे से जुड़ गई है.
उन्होंने राष्ट्रपति से मध्यप्रदेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग करते हुए कहा कि राष्ट्रपति संविधान और देश की संस्थाओं की सर्वोच्च संरक्षक हैं. कांग्रेस ने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और भारतीय सेना के सम्मान को ध्यान में रखते हुए इस मामले में हस्तक्षेप करेंगी.
पटवारी ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की है.
मई 2025 में शुरू हुआ था विवाद
यह पूरा विवाद मई 2025 में शुरू हुआ था. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था. इस सैन्य कार्रवाई के बारे में देश को जानकारी देने वाली अधिकारियों की टीम में कर्नल सोफिया कुरैशी भी शामिल थीं.
इसी दौरान मध्यप्रदेश के महू क्षेत्र के रायकुंडा गांव में आयोजित एक कार्यक्रम में विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर ऐसी टिप्पणी की थी, जिसे विवादित और आपत्तिजनक माना गया. इस बयान को उनके धर्म और पहलगाम हमले से जुड़े आतंकियों के समुदाय से जोड़कर देखा गया.
हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी का स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे गंभीर और आपत्तिजनक माना था. अदालत ने मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया. इसके बाद विजय शाह ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
सुप्रीम कोर्ट ने भी शाह की टिप्पणी पर कड़ी नाराजगी जताई और मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया. एसआईटी ने जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट दाखिल हो चुकी है, लेकिन अभियोजन के लिए राज्य सरकार की मंजूरी अभी बाकी है. अदालत के अनुसार भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 के तहत संबंधित अपराध का संज्ञान लेने के लिए यह मंजूरी जरूरी है. यह धारा विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य और घृणा को बढ़ावा देने जैसे अपराधों से संबंधित है.







