उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है. चुनाव नजदीक आते ही सभी दल अपनी रणनीति को अमलीजामा पहनाने में जुट गए हैं. इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी जिला और क्षेत्रीय इकाइयों के बाद अब विधानसभा प्रभारियों की नई सूची भी जारी कर दी है. इस पूरी सूची पर गौर करें तो साफ समझ आता है कि पार्टी ने सवर्ण जातियों, खासतौर पर ब्राह्मण समुदाय को साधने के लिए बड़ा दांव खेला है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हाल के दिनों में आरक्षण, यूजीसी और अन्य मुद्दों को लेकर सवर्णों के एक वर्ग में जो नाराजगी देखने को मिली थी, बीजेपी की यह रणनीति उसी को दूर करने का एक प्रयास है.
शुरुआत में पार्टी की तरफ से यह बात सामने आई थी कि विधानसभा प्रभारियों के रूप में ऐसे अनुभवी चेहरों को मौका दिया जाएगा जिनका सियासी अनुभव किसी मौजूदा विधायक से कम न हो. हालांकि, ज़मीन पर ऐसा पूरी तरह से लागू होता नहीं दिखा. कुल 403 विधानसभा प्रभारियों की इस लंबी सूची में सबसे ज्यादा भरोसा पुराने और पूर्व जिला पदाधिकारियों पर जताया गया है. पूरे महकमे में सिर्फ एक ही पूर्व विधायक मुंशीलाल गौतम को जगह मिल पाई है, जिन्हें जेवर विधानसभा सीट की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
अगर संगठन के हिसाब से देखें तो बीजेपी ने पूरे उत्तर प्रदेश को छह प्रमुख क्षेत्रों और कुल 98 जिलों में बांटा है. अवध क्षेत्र की बात करें तो यहाँ कुल 82 विधानसभा सीटें आती हैं और इसमें राजधानी लखनऊ भी शामिल है. इस इलाके में पार्टी ने सबसे ज्यादा 35 सीटों की कमान ब्राह्मण चेहरों को सौंपी है, जबकि 17 सीटों पर क्षत्रिय नेताओं को जिम्मेदारी मिली है.
वहीं दूसरी ओर, गोरखपुर क्षेत्र को राजनीतिक नक्शे पर बीजेपी का नया और मजबूत गढ़ माना जाता है. यहाँ कुल 62 विधानसभा सीटें हैं और इस क्षेत्र में भी पार्टी ने जासूसी समीकरण साधते हुए सबसे ज्यादा 24 ब्राह्मण और 15 क्षत्रिय नेताओं को विधानसभा प्रभारी बनाया है.
ब्रज क्षेत्र की बात करें तो मथुरा, वृंदावन, बरेली, आगरा और कन्नौज जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाके इसी के अंतर्गत आते हैं. इस क्षेत्र में कुल 65 विधानसभा सीटें हैं, जहाँ सबसे अधिक 18 पदों पर ब्राह्मण समाज के नेताओं को कमान दी गई है. इसके अलावा दस क्षत्रिय, छह जाट और पाँच लोध समुदाय के चेहरों को भी प्रभार सौंपा गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के कारण काशी क्षेत्र को बेहद अहम माना जाता है. यहाँ कुल 71 विधानसभा सीटें हैं और इस इलाके में भी 21 सीटों का जिम्मा ब्राह्मणों के हाथ में ही दिया गया है. इसके अलावा ठाकुर बिरादरी से नौ और ओबीसी वर्ग से 11 सीटों की कमान संभाली गई है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से बाकी इलाकों से थोड़ी अलग और बेहद संवेदनशील मानी जाती है. हालाँकि इस क्षेत्र में ब्राह्मणों की संख्या उतनी प्रभावी नहीं है, फिर भी यहीं से प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाली हवाएं चलती हैं. इस पश्चिम क्षेत्र की 71 सीटों पर समीकरण थोड़े बदले हुए हैं. यहाँ 13 क्षत्रिय, 12 जाट, नौ गुर्जर, सात वैश्य और केवल चार ब्राह्मण चेहरों को विधानसभा प्रभारी बनाया गया है. फिलहाल इस क्षेत्र में युवा और अल्पसंख्यक मोर्चों की क्षेत्रीय टीमों का गठन होना बाकी है, जबकि बाकी मोर्चों के लिए अब सीधे जिला स्तर पर टीमें बनाई जाएंगी.







