मध्यप्रदेश की राजनीति में इस समय सरकार और संगठन, दोनों ही स्तरों पर बड़े फेरबदल की सुगबुगाहट काफी तेज हो गई है. हाल ही में शासन-प्रशासन और पुलिस महकमे में की गई बड़ी सर्जरी के बाद अब सबकी निगाहें भाजपा के सांगठनिक ढांचे पर आ टिकी हैं. राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरों से चर्चा है कि आगामी नगरीय निकाय चुनावों और लंबे समय के 'मिशन 2028' को साधने के लिए पार्टी कई जिलों में 'नो परफॉर्मेंस, नो पोस्ट' का कड़ा पैमाना अपनाने की तैयारी में है.
दरअसल, भाजपा में हर तीन साल में सांगठनिक चुनाव कराने की एक तय व्यवस्था है. इसी कड़ी में केंद्रीय चुनाव अधिकारियों की निगरानी में प्रदेश से लेकर जिला स्तर तक नई टीमों के गठन की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. माना जा रहा है कि केंद्रीय आलाकमान और राज्य नेतृत्व आपस में विचार-विमर्श करके ही इन बदलावों को अंतिम रूप दे रहे हैं.
संगठन में यह बदलाव मुख्य रूप से तीन वजहों से जरूरी माना जा रहा है. पहला, कई जिलों में अंदरूनी गुटबाजी और पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किए जाने की शिकायतें मिल रही थीं. दूसरा, लंबे समय से जमे नेताओं को हटाकर नए और ऊर्जावान चेहरों को लाने से सत्ता विरोधी लहर को बेअसर किया जा सकेगा. तीसरा, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व संगठन में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर खास जोर दे रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि महाकौशल, मालवा-निमाड़ और बुंदेलखंड अंचल के जिलों जैसे रायसेन, नर्मदापुरम, खरगोन, सिवनी, बालाघाट और टीकमगढ़ में सबसे पहले नए चेहरों की एंट्री हो सकती है. इस बार केवल उन्हीं जिला अध्यक्षों को दोबारा मौका मिलेगा जिनका काम और जमीनी पकड़ बहुत मजबूत रही है. किसी भी तरह के विरोध या असंतोष से बचने के लिए पार्टी ने पर्यवेक्षकों को सीधे मैदान में उतारा है, जो स्थानीय स्तर पर रायशुमारी करके ही नाम तय कर रहे हैं.







