सिवनी/खबर डिजिटल/संतोष वन्देवार/ केवलारी विकासखंड के सरेखा लालोपर मार्ग की वर्षों पुरानी समस्या एक बार फिर सामने आई है। बरसात के कारण नाले में उफान आने से स्कूल से लौट रहे मासूम छात्र छात्राएं घंटों रास्ते में फंसे रहे। सवाल यह है कि आखिर इन बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है, देखिए यह विशेष रिपोर्ट।
केवलारी क्षेत्र के ग्राम सरेखा और लालोपर को सिवनी मंडला मुख्य मार्ग से जोड़ने वाले नाले पर पुल या पुलिया नहीं होने का खामियाजा एक बार फिर ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ा,
स्कूल की छुट्टी के बाद शाम करीब 5 बजकर 10 मिनट पर छात्र छात्राएं सरेखा मार्ग पर पहुंचे, लेकिन तब तक नाले का पानी तेजी से बढ़ चुका था। शाम 6 बजे तक भी जलस्तर कम नहीं हुआ। लगभग एक घंटे तक बच्चे नाले के दोनों ओर अपने परिजनों से अलग खड़े रहे। एक ओर मासूम बच्चे थे तो दूसरी ओर उनके माता-पिता, लेकिन बीच में उफनता नाला उनकी बेबसी का कारण बना रहा।
ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई नई समस्या नहीं है। हर वर्ष बरसात में यही हालात बनते हैं। लगभग 100 से 150 विद्यार्थी कई दिनों तक स्कूल और कॉलेज नहीं पहुंच पाते, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है और भविष्य पर भी असर पड़ता है।
कुछ दिन पहले ही केवलारी में आयोजित जनसुनवाई में सरेखा और लालोपर के ग्रामीणों, महिलाओं, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों ने जिला कलेक्टर के समक्ष इस समस्या को प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने नाले पर स्थायी पुल या पुलिया निर्माण की मांग करते हुए ज्ञापन भी सौंपा था, ताकि बरसात के दिनों में बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों का आवागमन बाधित न हो।
ग्रामीणों का आरोप है कि समस्या की गंभीरता को देखते हुए अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि यदि समय रहते पुल निर्माण की अनुशंसा कर शासन स्तर पर पहल की गई होती, तो आज बच्चों को इस तरह जोखिम उठाकर घर नहीं लौटना पड़ता।
स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि जब नाला उफान पर था, तब मौके पर न तो पुलिस बल तैनात था और न ही प्रशासन की ओर से किसी कर्मचारी की व्यवस्था की गई थी, जो बच्चों और ग्रामीणों को जोखिम भरे रास्ते से गुजरने से रोक सके। ऐसे में यदि कोई दुर्घटना होती है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी,
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि नाले पर जल्द से जल्द स्थायी पुल या पुलिया का निर्माण कराया जाए और जब तक निर्माण नहीं होता, तब तक बरसात के दौरान सुरक्षा और वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
सवाल यही है कि हर साल दोहराई जाने वाली इस समस्या का स्थायी समाधान आखिर कब होगा, क्या इस बार प्रशासन सरेखा लालोपर के बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा को प्राथमिकता देगा, या फिर यह मुद्दा भी वर्षों की तरह केवल आश्वासनों तक ही सीमित रहेगा, अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और शासन के अगले कदम पर टिकी हैं।







