MP Contract workers: मध्य प्रदेश में पिछले 25-30 सालों से नियमित होने का सपना देख रहे लाखों कर्मचारियों के लिए बुधवार का दिन विजयादशमी जैसा साबित हुआ। जबलपुर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें संविदा कर्मचारियों को नियमित करने के सिंगल बेंच के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
लाखों लोगों के भविष्य का सवाल : हाईकोर्ट
बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकीलों ने सिंगल बेंच के 9 अप्रैल के फैसले पर स्थगन मांगा था। हालांकि, डबल बेंच ने सरकार को झटका देते हुए कहा, यह एक बहुत बड़े वर्ग के भविष्य का सवाल है, इसलिए हम इस पर स्टे नहीं देंगे। आप सिंगल बेंच के आदेश का पालन कीजिए और वहीं अपना पक्ष रखिए।
क्या था वो फैसला?
दरअसल, 9 अप्रैल को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने आदेश दिया था कि जिन संविदा कर्मचारियों ने 10 साल की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें 7 अक्टूबर 2016 की नीति का लाभ दिया जाए। जिस तरह दैनिक वेतन भोगियों को विनियमित कर 'स्थाई कर्मचारी' बनाया गया था, उसी तरह संविदा कर्मियों को भी नियमित वेतनमान, महंगाई भत्ता और वार्षिक इंक्रीमेंट प्रदान की जाए।
25 साल का शोषण खत्म!
मध्य प्रदेश संविदा कर्मचारी अधिकारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रमेश राठौर ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे न्याय की जीत बताया। उन्होंने कहा है कि हम पिछले तीन दशकों से शोषण का शिकार हो रहे थे। हर साल नवीनीकरण के नाम पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती थी। न इंक्रीमेंट मिलता था, न महंगाई भत्ता और न ही सरकारी आवास। हमें दोयम दर्जे का कर्मचारी समझा जाता था, लेकिन हाईकोर्ट ने हमारा दर्द समझा है।
अब सीएम के पाले में गेंद
कर्मचारी महासंघ ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मांग की है कि सरकार अब और अधिक कानूनी दांव-पेंच में फंसने के बजाय हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करे। महासंघ ने मांग की है कि तत्काल प्रभाव से 2 लाख संविदा और 3 लाख आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित कर उन्हें सभी सरकारी सुविधाएं प्रदान की जाएं।







