चंदेरी: साड़ा कॉलोनी घोटाले में FIR का डर भी बेअसर, रसूखदारों ने कूट-रचना कर सरकारी जमीन पर जमाया कब्जा

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Khabar Digital Desk

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चंदेरी: साड़ा कॉलोनी घोटाले में FIR का डर भी बेअसर, रसूखदारों ने कूट-रचना कर सरकारी जमीन पर जमाया कब्जा

भूमिका विश्वकर्मा/ खबर डिजिटल/ चंदेरी। विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (SADA) कॉलोनी चंदेरी में बेशकीमती सरकारी भूमि के आवंटन में हुए बड़े खेल की जांच प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ गई है। तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह और एसडीएम शुभ्रता त्रिपाठी के सख्त निर्देशों के बावजूद, 8 सदस्यीय जांच दल आधा साल बीतने के बाद भी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका है। आलम यह है कि 10 दिन में रिपोर्ट पेश करने का आदेश अब कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया है, जिससे जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।

​दस्तावेजों में कूट-रचना

​शिकायत है कि नगरपालिका के रसूखदारों ने राजस्व विभाग से सांठगांठ कर अभिलेखों में बड़े पैमाने पर हेरफेर (कूट-रचना) की है। नियमानुसार, साड़ा कॉलोनी के भूखंड भूमिहीन और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए थे, लेकिन नगरपालिका के जिम्मेदारों ने अपनों और अपने परिवार के सदस्यों को रेवड़ियों की तरह प्लॉट बांट दिए। इस बंदरबांट के कारण न केवल पात्र नागरिक अपने हक से वंचित रह गए, बल्कि शासन को भी करोड़ों रुपये की वित्तीय क्षति हुई है।

​1981 से शुरू हुआ सफर, 1995 के बाद बदला खेल

​ज्ञातव्य है कि वर्ष 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने फतेहाबाद, रामनगर और प्राणपुर को मिलाकर साड़ा का गठन किया था। वर्ष 1992 में स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की अध्यक्षता में आवास हेतु MIG, LIG और EWS श्रेणियों के भूखंडों के लिए पंजीकरण प्रक्रिया शुरू हुई। परंतु, वर्ष 1995 में साड़ा के समाप्त होने और नगरपालिका के पुनः अस्तित्व में आने के बाद असली खेल शुरू हुआ। नगरपालिका ने आवंटन का जिम्मा संभालते ही विधि-विरुद्ध तरीके से भूखंडों के रिकॉर्ड बदले और बिना सीमांकन किए शासकीय भूमि पर भी निजी दावे ठोक दिए।

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​जांच के घेरे में ये मुख्य बिंदु

  • ​मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच दल को निम्नलिखित बिंदुओं पर पड़ताल करनी थी:
  • ​नगरपालिका के पूर्व व वर्तमान अधिकारियों, कर्मचारियों और उनके परिजनों के नाम आवंटित भूखंड।
  • ​साड़ा कॉलोनी की सीमा से लगी राजस्व भूमि पर हुए अतिक्रमण और मालिकाना हक के दस्तावेज।
  • ​पंजीयन राशि, किस्तें, नामांतरण और रजिस्ट्री के रिकॉर्ड का बैंक खातों से मिलान।
  • ​अभिलेखों में की गई कांट-छांट और बंटांकन करने वाले अधिकारियों की भूमिका।
  • ​साड़ा गठन के समय प्रस्तावित भूखंडों की वास्तविक संख्या और वर्तमान स्थिति।

​गुम फाइलें और FIR का पेच

​जांच में सबसे बड़ा रोड़ा रिकॉर्ड का गायब होना बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि नगरपालिका की रिकॉर्ड शाखा से कई महत्वपूर्ण फाइलें नदारद हैं। हालांकि, जिन जिम्मेदारों के कार्यकाल में फाइलें गुम हुईं, उन पर FIR दर्ज कराने के आदेश भी दिए गए थे, लेकिन महीनों बाद भी पुलिस कार्यवाही ठंडे बस्ते में है। राजस्व निरीक्षक को दिए गए निर्देशों के बावजूद एफआईआर दर्ज न होना, कहीं न कहीं बड़े संरक्षण की ओर इशारा करता है।

​प्रशासनिक लचर रवैया

​तहसीलदार, नायब तहसीलदार और सीएमओ सहित 8 अधिकारियों की टीम 6 महीने में यह भी तय नहीं कर पाई कि घोटाले की जड़ें कहां तक फैली हैं। जबकि पूर्व कलेक्टरों ने समय-समय पर नामांतरण और विक्रय पर रोक लगाई थी, फिर भी नगरपालिका के जिम्मेदारों ने नियमों को ताक पर रखकर रजिस्ट्रियां जारी रखीं। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इन फाइलों को पाताल से खोजकर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजता है या चंदेरी की जनता के हितों की बलि इसी तरह चढ़ती रहेगी।

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