एसबीआई अनुसंधान रिपोर्ट - वैश्विक व्यापार जगत में मची खलबली के बीच, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए व्यापक व्यापार शुल्कों (Executive Tariffs) को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। 6-3 के बहुमत से दिए गए इस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि शांति काल में कर या शुल्क लगाने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। इस फैसले के तुरंत बाद, अमेरिकी प्रशासन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 का उपयोग कर सभी आयातों पर 10% का नया अस्थायी वैश्विक टैरिफ लागू कर दिया है।
अदालती फैसला और ट्रिलियन डॉलर का संकट
सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' (IEEPA) के दुरुपयोग पर रोक लगाते हुए व्यापारिक शक्तियों को फिर से कांग्रेस के पाले में डाल दिया है। इस फैसले के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
- भारी रिफंड की संभावना: 'कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड' अब यह तय करेगा कि पूर्व में वसूले गए 160 से 175 बिलियन डॉलर के टैरिफ को वापस किया जाए या नहीं।
- व्यापार समझौतों पर खतरा: चीन, जापान और यूके जैसे देशों के साथ हुए खरबों डॉलर के मौजूदा व्यापार सौदों पर अनिश्चितता बढ़ गई है।
प्रशासन की जवाबी कार्रवाई: धारा 122 का ऐतिहासिक प्रयोग
अदालती झटके के बावजूद, अमेरिकी प्रशासन ने अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए 'बैलेंस ऑफ पेमेंट' (भुगतान संतुलन) का हवाला देते हुए वैकल्पिक रास्ता चुना है:
- 10% वैश्विक शुल्क: 24 फरवरी, 2026 से अगले 150 दिनों के लिए अमेरिका आने वाले सभी सामानों पर 10% का अतिरिक्त शुल्क देना होगा।
- छूट और पाबंदियां: USMCA समझौते के कारण कनाडा और मेक्सिको को इस नए टैरिफ से राहत दी गई है।
- भारत पर प्रभाव: भारत जैसे देशों को स्टील और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों पर धारा 232 के तहत पहले से चल रहे विशेष शुल्कों का सामना करना जारी रहेगा।
बाजार पर असर और आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि इस खींचतान से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) प्रभावित हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता आ सकती है। चूंकि प्रशासन का यह नया कदम केवल 150 दिनों के लिए वैध है, इसे स्थायी बनाने के लिए अंततः अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी की आवश्यकता होगी।
महत्वपूर्ण नोट: यह घटनाक्रम 2026 के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकता है, जिससे भारत जैसे निर्यातक देशों के लिए अमेरिका को सामान भेजना महंगा हो जाएगा।







